
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भारत की विविधता लोकतंत्र की ताकत
राष्ट्रमंडल देशों की संसद के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का गुरुवार को 28वां सम्मेलन हुआ। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत ने विविधता को अपने लोकतंत्र की ताकत बनाया है और दुनिया को दिखाया है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं और प्रक्रियाएं उसके विकास को स्थिरता, गति तथा स्तर (स्केल) प्रदान करते हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र एक बड़े पेड़ की तरह है जिसकी जड़ें गहरी हैं। भारत में, लोकतंत्र का मतलब है अंतिम पायदान तक सेवाओं की पहुंच। प्रधानमंत्री ने कहा, जब भारत को आजादी मिली, तो कई लोगों को संदेह था कि देश की इतनी अधिक विविधता के बीच लोकतंत्र टिक पाएगा या नहीं। हालांकि, यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की शक्ति बन गई। उन्होंने कहा कि जन कल्याण की भावना के साथ उठाए गए सरकार के कल्याणकारी कदम बिना भेदभाव के सभी लोगों तक पहुंचते हैं। इस भावना की वजह से 25 करोड़ लोग पिछले कुछ साल में गरीबी से बाहर आए हैं। संविधान सदन (पुराने संसद भवन) के केंद्रीय कक्ष में 14 से 16 जनवरी तक आयोजित हो रहे सीएसपीओसी में 42 राष्ट्रमंडल देशों के 61 स्पीकर और पीठासीन अधिकारी भाग ले रहे हैं। चौथी बार भारत इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थ व्यवस्था
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। भारत में यूपीआई के साथ सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान प्रणाली भी है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात निर्माता भी है और तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट अप इकोसिस्टम है। प्रधानमंत्री ने कहा देश में तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार, चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क, तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो रेल नेटवर्क है।
भारत दुग्ध उत्पादन में अग्रणी
28वें सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा यह सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा धान उत्पादक देश भी है।मोदी ने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों की करीब 50 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जिसने सभी देशों के विकास में हरसंभव योगदान का प्रयास लगातार किया है। उन्होंने कहा, भारत अपने साझेदार देशों से सीखने का सतत प्रयास करता है और यह भी सुनिश्चित करता है कि भारत के अनुभवों का लाभ अन्य राष्ट्रमंडल देशों को भी मिले। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में बहस, संवाद और मिलकर फैसला लेने की लंबी परंपरा रही है। इसमें आज के कई संसदीय मुद्दों पर चर्चा हो रही है, जिनमें मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं को बनाकर रखने में अध्यक्ष (स्पीकर) और पीठासीन अधिकारी की भूमिका भी शामिल है।

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