
बच्चों को दिमागी तौर से कमजोर कर रहे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
सोशल मीडिया का बढ़ता क्रेज बच्चों के लिए खतरा बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का अत्यधिक उपयोग बच्चों को दिमागी तौर पर बीमारी की ओर ढकेल रहा है। आस्ट्रेलिया ने तो 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर पाबंदी ही लगा दी है।

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सोशल मीडिया ज्यादा नहीं तीन चार दशक पीछे झांक कर देखे तो बच्चों का बचपन और खेलकूद के ज्यादातर साधन आउटडोर वाले होते थे, जो बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में मददगार बनते थे। लेकिन आज के बच्चे पैदा होने के कुछ महीनों बाद ही किसी न किसी रूप में मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया से जुड़ जाते हैं। कभी मां बच्चों को सुलाने के लिए फोन की ध्वनि का इस्तेमाल करती है तो कभी बच्चे नन्हीं-नन्हीं उंगलियों से स्क्रीन रोलिंग शुरू कर देते है, जो शुरुआत में माता-पिता को खूब अच्छा लगता है। लेकिन यह बच्चों के लिए कितना घातक होता है, यह लम्बे समय बाद उन्हें पता लगता है। लगातार स्क्रॉलिंग और नोटिफिकेश बच्चों में अटेंशन, डेफिसिट, हाइपरएक्टिविटी डिस ऑर्डर यानि (adhd) जैसे लक्षणों का खतरा बढ़ रहा है। मीडिया रिपोर्टस के अनुसार अमेरिका में एक रिसर्च की गई। इसमें हजारों बच्चों को शामिल किया गया। रिपोर्ट में सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताने वाले बच्चों में ध्यान कम होने, बेचैनी और उतावलेपन जैसे लक्षण सामने आए। जोकि (adhd) का संकेत हो सकते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि छोटी उम्र में बच्चों के दिमाग का विकास चल रहा होता है। ऐसे में डिजिटल डिस्ट्रैक्शन का असर और गंभीर हो जाता है। जो बच्चों के दिमागी विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता हैं।
नोटिफिकेशन तोड़ देते हैं ध्यान
सोशल मीडिया इन दिनों हर उम्र के लोग सोशल मीडिया से कहीं न कहीं से जुड़े हैं। यानि स्कूल, कॉलेज, व्यवसायिक और अव्यवसायिक सब कोई सोशल मीडिया से जुड़ा है। यूजर्स फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट पर हर समय सक्रिय रहते हैं। उन्हें यह देखने की जल्दी होती है कि फला ने मेरी प्रतिक्रिया पर क्या राय दी। या उसकी प्रतिक्रिया क्या रही, मेरी फोटो पर कितने लाइक आए, लाइक कम क्यों आए। ऐसे में जब मैसेज का नोटिफिकेशन आता है वह अन्य कामों में लगी एकाग्रता भंग कर उस ओर ध्यान लगा देता है। ध्यान बार-बार एप खोलने के लिए मजबूर करता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्वीडन के karolinska institute और oregon health & science university ने मिलकर शोध किया। रिसर्चर्स ने बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के नोटिफिकेशंस बच्चों के दिमाग की फोकस करने की क्षमता को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। अचानक आने वाला एक नोटिफिकेशन बच्चे के दिमाग को उसके काम के फोकस से हटाता है और दूसरे एप की ओर ले जाता है।
ऑस्ट्रेलिया ने किशोरों पर क्या प्रतिबंध लगाया
सोशल मीडिया में ऑस्ट्रेलिया (Australia) में किशोरों पर सोशल मीडिया के उपयोग पर बैन लगाने के लिए एक बिल पास किया गया। इसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ऑस्ट्रेलिया की संसद में नवंबर 2024 में एक कानून पारित कराया गया था। इसके जरिए ऑस्ट्रेलिया के ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट, 2021 में संशोधन किया गया और 16 साल से कम उम्र के किशोरों के सोशल मीडिया प्रयोग पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया गया। पहले इस कानून के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सिर्फ कुछ सामग्री ही प्रतिबंधित थी। हालांकि, नए कानून के तहत किशोरों के लिए पूरे सोशल मीडिया पर ही पाबंदी रहेगी। इससे ऑस्ट्रेलिया ऐसा करने वाला पहला देश बन गया है। हालांकि इसके अलावा, चिली और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने स्कूलों में फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि चीन में बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को लेकर सख्त नियम हैं। अब भारत में इसकी पहल होनी चाहित क्योंकि भारत एक सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। और यहां अन्य देशों की तुलना में यहां किशोरों की संख्या कई गुना अधिक है।

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