
सम्राट चौधरी : जानिए समता पार्टी से निकलकर सीएम तक का सफर
सम्राट चौधरी 15 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री बने। वह बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री हैं। समता पार्टी से निकलकर सीएम बनने तक का सफर आसान नहीं रहा।

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सम्राट चौधरी बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली। चौधरी इस पद पर आसीन होने वाले, भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने चौधरी को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के शीर्ष नेता भी शामिल हुए। राज्य में सत्तारूढ़ राजग में भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड) और तीन अन्य पार्टियां शामिल हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और चिराग पासवान, नीतीश कुमार और राजग के सभी विधायक शामिल थे। नीतीश कुमार अब राज्यसभा सदस्य हैं। उन्होंने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। चौधरी 2017 में भाजपा में शामिल हुए थे। उन्हें मंगलवार को भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे शीर्ष पदाधिकारियों की उपस्थिति में विधायक दल का नेता नामित किया गया था।
सम्राट चौधरी को विरासत में मिली राजनीति
सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर, 1968 में हुआ था। सम्राट के पिता शकुनी चौधरी अलग-अलग पार्टियों से कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रहे हैं। समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शकुनी चौधरी भी एक हैं। बिहार में कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शकुनी चौधरी शुमार किए जाते हैं। सम्राट चौधरी की मां पार्वती देवी तारापुर से विधायक रह चुकी हैं। सम्राट चौधरी ने 1990 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और शुरुआती दिनों में समता पार्टी से जुड़े। 1999 में वे राबड़ी देवी की राजद सरकार में कृषि मंत्री बने, लेकिन कम उम्र से जुड़े विवाद के कारण उन्हें उस पद से इस्तीफा देना पड़ गया। सन 2000 में बिहार के सबसे कद्दावर नेता लालू प्रसाद यादव घोटाले के आरोप में जेल आ जा रहे थे। उनकी जगह उनकी पत्नी राबड़ी देवी राज्य की सत्ता पर काबिज थीं। इन सबके बीच हुए चुनाव में परबत्ता सीट पर लालू की राजद से सम्राट चौधरी ने जीत दर्ज की। इस तरह वे राजद के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। हालांकि, एक बार फिर उनकी उम्र को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद उनका निर्वाचन रद्द कर दिया गया। 2004 में सम्राट चौधरी का निर्वाचन रद्द होने के बाद परबत्ता सीट पर उपचुनाव कराए गए। 2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। पहली बार फरवरी में और दूसरी बार अक्टूबर में। बिहार में ऐसा पहली बार हुआ था जब एक ही साल में दो बार चुनाव हुए थे। फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू के रामानंद प्रसाद सिंह ने जीत दर्ज की थी और दोबारा भी वही चीते। 2010 के विस चुनावों में परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर विधायक चुने गए।
सम्राट चौधरी राजद से पहुंचे जदयू
सम्राट चौधरी ने साल 2014 में राजद के 13 विधायकों को अलग कर जदयू में शामिल होने की रणनीति बनाई। इसके बाद 2014 में ही जीतन राम मांझी की सरकार में उन्हें नगर विकास और आवास मंत्री बनाया गया। 2015 में जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार से बगावत की। मांझी ने जब हम बनाई तो सम्राट के पिता शकुनी चौधरी भी इसके सक्रिय सदस्य बने। हम पार्टी का सहयोग करने पर जनवरी 2016 में उनकी विधान परिषद सदस्यता रद्द कर दी गई।
सम्राट चौधरी ने 2017 में ओढ़ा भगवा चोला
सम्राट चौधरी जून 2017 में भाजपा में शामिल हो गए और 2018 में पार्टी की बिहार इकाई के प्रदेश उपाध्यक्ष बने। 2020 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए और 2021 में एनडीए सरकार में पंचायती राज मंत्री बने। 2022 में उन्हें बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चुना गया। इसके बाद, मार्च 2023 में उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिस पद पर वे 26 जुलाई 2024 तक रहे। 2024 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए में वापसी की, तो सम्राट चौधरी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और उन्हें वित्त व स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग दिए गए। 2025 के विधानसभा तारापुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। 2025 में लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ बिहार का गृह मंत्री भी बनाया गया।
सीएम सम्राट चौधरी की शिक्षा पर उठते रहे सवाल
सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता बिहार की राजनीति में अक्सर बहस का विषय रही है। सम्राट चौधरी ने शुरुआती शिक्षा बिहार से पूरी की। इसके बाद उन्होंने मधुराई कामराज विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। अपने चुनावी हलफनामे में उन्होंने प्री-फाउंडेशन कोर्स (PFC) का जिक्र किया है। यह पारंपरिक ग्रेजुएशन डिग्री नहीं मानी जाती। इसी कारण उनकी क्वालिफिकेशन पर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि उन्होंने इसे अपनी शैक्षणिक उपलब्धि बताया है। सम्राट चौधरी के पास मानद डीलिट की उपाधि भी बताई जाती है। यह एक सम्मानित उपाधि होती है, न कि नियमित डिग्री। इसे किसी विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान स्वरूप दिया जाता है। इसी वजह से इसे लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

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