
अमेरिका-ईरान युद्ध थमा,नाटो पर संकट के बादल मंडराए
अमेरिका-ईरान युद्ध सीजफायर के बाद थम गया। युद्ध के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो के बीच तनाव दिखा। जो नाटो के विघटन की ओर संकेत हैं।

अश्वनी प्रताप सिंह
अमेरिका-ईरान युद्ध 40वें दिन बुधवार को सीजफायर के साथ रुक गया। लेकिन इस युद्ध ने नाटो और अमेरिका के बीच दूरी बना दी। दरअसल जब ईरान ने मिडिल ईस्ट के देशों पर हमला किया तो अमेरिका ने नाटो को युद्ध में शामिल होने को कहा। लेकिन नाटो के सदस्यों ने यह कहकर पल्लाझाड़ लिया कि ईरान ने अमेरिका पर हमला किया ही नहीं। बल्कि अमेरिका ने स्वयं के फायदे के लिए ईरान पर हमला किया। नाटो के नियमों के तहत जब कोई देश नाटो सदस्य देशों पर हमला करेगा तो उसमें नाटो देश शामिल होंगे। इसके बाद एक-एक कर नाटो सदस्यों से अमेरिका की तल्खी मीडिया में खूब सुर्खियां बनीं। ऐसे में इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि नाटो अब ज्यादा दिन नहीं चल पाएगा।
ट्रंप ने फिर की नाटो की आलोचना
अमेरिका-ईरान युद्ध में सीजफायर के बाद गुरुवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में नाटो महासचिव मार्क रुट्टे के साथ एक निजी बैठक की। बैठक के बाद ईरान युद्ध में अमेरिका का समर्थन न करने के लिए नाटो की फिर से आलोचना की। यह जानकारी बीबीसी ने गुरुवार को दी। बैठक के बाद ट्रुथ सोशल पर साझा की गई एक पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, 'जब हमें नाटो की जरूरत थी तब वे मौजूद नहीं थे और अगर हमें उनकी फिर से जरूरत पड़ी तो वे मौजूद नहीं होंगे।' इस बीच, स्पष्ट मतभेदों के बावजूद रुट्टे ने सीएनएन को ट्रंप के साथ अपनी मुलाकात को बहुत स्पष्ट और बहुत खुला करार दिया। बुधवार को होने वाली वार्ता से पहले, ट्रंप ने नाटो से बाहर निकलने के विचार पर गौर किया था क्योंकि कई नाटो देशों ने वैश्विक तेल की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में मदद करने के उनके आह्वान का विरोध किया था।
नाटो टूटा तो बढ़ेगी असुरक्षा की भावना
अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान जिस तरह से ईरान ने मिडिल ईस्ट के देशों पर बम बरसाए इससे देशों सुरक्षा को लेकर नई कवायद शुरू हो गई। अमेरिका या नाटो के सहारे वाले देशों में उलझन बढ़ी है। क्योंकि उन्हें पता है कि अगर नाटो टूटा तो वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है। रूस और चीन का प्रभाव बढ़ जाएगा। यूरोप में युद्ध का खतरा बढ़ेगा और अमेरिका की वैश्विक ताकत कम होगी। यह सामूहिक रक्षा तंत्र के खात्मे, बड़े पैमाने पर आर्थिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अनिश्चितता का कारण बन सकता है। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए स्वतंत्र और मजबूत व्यवस्था बनानी पड़ेगी, जो महंगी और समय लेने वाली होगी। अमेरिका की वैश्विक सैन्य भूमिका कमजोर होगी। क्योंकि दुनिया भर में उसके सैन्य बेस व लॉजिस्टिक हब्स हैं जो हट सकते हैं। साथ ही सुरक्षा और अनिश्चितता से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। दरअसल नाटो को वैश्विक स्थिरता का आधार माना जाता है, इसके टूटने से दुनिया में उपनिवेशवाद, आक्रमण और युद्ध के हालात पैदा हो सकते हैं खास तौर से उन छोटे देशों में जो सिर्फ इसलिए ही नाटो के सदस्य बने हैं ताकि वह सुरक्षित रह सकें और कोई देश उन पर हमला नहीं करे।
भारत के लिए चीन बन सकता चिंता का कारण
अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान जिस तरह से हालात बदले हैं उससे नाटो पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भले ही भारत नाटो का सदस्य नहीं है लेकिन यदि नाटो टूटा तो चीन के अधिक आक्रामक हो सकता है। जो भारत के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक बड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में उभरकर आएगी। साथ ही वैश्विक अनिश्चितता भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है। यानि भारत का हित भी नाटो के बने रहने से हैं पर युद्ध के दौरान बने हालातों के बाद इसकी गुंजाइश कम ही नजर आती है।
12 से 32 देशों का बना संगठन
अमेरिका-ईरान युद्ध ने नाटो देशों की बीच दरार डालने का काम किया है। बता दें कि नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के विस्तार को रोकना और यूरोप में शांति सुनिश्चित करना था। एक के लिए सभी, सभी के लिए एक सिद्धांत पर काम करता है। जहां किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की राजनीतिक और सैन्य साधनों के माध्यम से रक्षा करना। स्थापना के दौरान इसमें 12 देश बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका थे। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में बनाया गया। बाद में ग्रीस, जर्मनी, तुर्की, हंगरी, स्पेन, पोलैंड, चेक गणराज्य, अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, एस्टोनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया, लातविया, लिथुआनिया, स्लोवेनिया, मोंटेनेग्रो, उत्तरी मैसेडोनिया और 2023 में फिनलैंड और 2024 में स्वीडन नाटो का सदस्य बन गया। इससे नाटो देशों की संख्या 32 हो गई।

अश्वनी प्रताप सिंह
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